Tuesday, November 19, 2013
साइकिल पर सभ्यता का संकट
सुनीता नारायण
इन दिनों जब मैं यह लिख रही हूं, अपने बिस्तर पर पडी हूं और एक ऐसे एक्सीडेंट से उबरने की कोशिश कर रही हूं जिसने मेरी हड्डियां तोड दी हैं। मुझे एक कार ने तब टक्कर मार दी थी जब मैं साइकिल पर सवार होकर कहीं जा रही थी। टक्कर मार कर कार गायब हो गयी और मैं सडक पर लहूलुहान तडपती रही। ऐसा देश के हर शहर की तकरीबन हर सडक पर होता रहता है क्योंकि हमारे यहां सडकों पर पैदल यात्रियों और साइकिल सवारों की सुरक्षा की परवाह नहीं की जाती। ये लोग अक्सर बहुत मामूली सा काम करने हुए मर जाते हैं-जैसे सडक पार करना। मैं खुशनसीब थी कि मेरे लिए दो कार रूकीं। अजनबियों ने मेरी मदद की और मुझे अस्पताल तक पहुंचाया जहां मेरा इलाज हुआ। अब मैं स्वस्थ होकर फिर से वापसी करूंगी।
यह एक ऐसी जंग है जिस पर हम सभी को ध्यान देने की जरूरत है। हमें पैदल चलने और साइकिल चलाने के लिए जगह की जरूरत है और इस अधिकार को हम छोड नहीं सकते। जब से मेरे साथ यह एक्सीडेंट हुआ, मेरे रिश्तेदार और दोस्त मुझे लगातार इस बात के लिए फटकारते रहे हैं कि मैं दिल्ली की सडकों पर इस तरह लापरवाह होकर साइकिल क्यों चला रही थी, मुझे लगता है कि वे लोग सही कह रहे हैं। यहां साइकिल सवारों और पदयात्रियों के लिए कोई अलग लेन नहीं है, सडकों के बाद जो थोडी जगह बच जाती है, उन पर या तो कूडे के ढेरों का कब्जा होता है या वहां भी कार ही पार्क कर दी जाती हैं। सडकें कार के लिए हैं, बाकी किसी का कोई महत्व नहीं है। वैसे यहां साइकिल चलाना या पैदल चलना सिर्फ इसलिए कठिन नहीं है कि इसके लिए कोई योजना नहीं बनी है बल्कि इसके पीछे हमारी उस मानसिकता का भी दोष है जो यह मानतीहै कि केवल कार पर चलने वालों का ही स्टेट्स होता है और सडकों पर उन्हीं का अधिकार है जो साइकिल पर चलते हैं, गरीब हैं, दयनीय हैं और अगर मिट नहीं गये तो उन्हें अंततः हाशिए पर ही चले जाना है।
यही वह बात है जिसे बदलना होगा। हमारे पास कोई विकल्प नहीं है, सिवा इसके कि हम परिवहन के मसले को फिर से परिभाषित करें। जैसा मैं बार-बार कहती रहती हूं। इस हफ्ते दिल्ली की फिजा में जहरीले धुएं का साया और गहरा गया है। पिछले महीने विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वायु प्रदूषण को मानवीय कैंसर की संज्ञा दी थी। हमें हर हाल में समझना होगा कि प्रदूषण को किसी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। यह हमें मार रहा है और यह प्रक्रिया अब धीमी नहीं रही है। अगर हम वायु प्रदूषण से मुकाबला करना चाहते हैं तो हमारे पास कार की बढती संख्या पर लगाम लगाने के सिवाय कोई दूसरा चारा नहीं है।
हमें सीखना होगा कि कैसे लोग चलें, कारें नहीं। पिछली सजी के आखिरी दशक के मध्य में जब सेंटर फार साइंस एंड एन्वायरमेंट ने वायु प्रदूषण के खिलाफ अपनी मुहिम की शुरूआत की थी तो उसके प्रयास पूरी तरह पारंपरिक थे, उसने ईंधन की गुणवत्ता बेहतर करने, वाहनों के प्रदूषण स्तर को बेहतर बनाने और जगह-जगह पर इसकी जांच करने जैसी प्रक्रियाओं पर जोर दिया। उसने कम्प्रेस्ड नेचुरल गैस का इस्तेमाल बसों और आटोरिक्शा के लिए किए जाने की पैरवी की। इसमें कोई शक नहीं है कि अगर ये कदम नहीं उठाये जाते तो हालात और भी बदतर होते। मगर ये उपाय पर्याप्त साबित नहीं हुए। बहुत जल्द हमने यह समझ लिया। प्रदूषण का स्तर फिर से बढने लगा। सभी शोधों से एक ही कारण सामने आ रहा है और एक ही बडा समाधान दिख रहा है। वह है परिवहन तंत्र को अलग तरीके से विकसिती करना। हमारे पास ऐसा करने के विकल्प भी हैं। हमें और मोटराइज्ड होने, और प्लाईओवर बनाने या फोर लेन सडक बनाने की कतई जरूरत नहीं है, भारत के कई शहरों में आज भी लोग बसों पर सफर करते हैं, पैदल और साइकिलों पर चलते हैं।
ज्यादा से ज्यादा 20 फीसदी लोग ही बाइक पर चलते हैं। हम ऐसा करते हैं क्योंकि हम गरीब हैं पर अब चुनौती यह है कि अमीर होने के बावजूद हम ऐसा करें और इसी तरह अपने शहरों की परिवहन व्यवस्था को लागू करें। पिछले कुछ सालों से वस्तुतः हम यही करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि हमारे शहरों के लिए समेकित और सुरक्षित जन परिवहन विकल्प विकसित हो सके। इसलिए अगर हमारे पास कार है भी तो भी हमें इसे चलाने की जरूरत न पडे। हम मेट्रो रेल विकसित कर सकते हैं या बसें खरीद सकते हैं। मगर जब तक इसकी कनेक्टिविटी अंतिम घर तक नहीं होगी, यह कारगर नहीं होगा। इस व्यवस्था को सहज और सरल होना चाहिए। इसीलिए मैं कहती हूं कि हमें अलग तरीके से सोचने की जरूरत है। आज परिवहन तंत्र की चर्चा हो रही है जबकि हमें साइकिल सवारों और पदयात्रियों के लिए भी सोचने की जरूरत है, मगर यह खोखली बातें हैं।
(साभारःप्रभात)
Friday, November 15, 2013
India against pollution: I-next के प्रथम पृष्ठ पर छपी कवर स्टोरी
India against pollution: I-next के प्रथम पृष्ठ पर छपी कवर स्टोरीshivvijays45@gmail.com
साइकिल वालों के राज में ही बेगानी हो गई साइकिल
उत्तर प्रदेश में है साइकिल वालों की सरकार
राजधानी में ही नहीं है साइकिल लेन है और न साइकिल स्टैंण्ड,
दिल्ली में साइकिल टैक्स फ्री, यूपी में लगता है 9 फीसदी टैक्स
दूसरे मुल्कों से क्यों सबक नहीं लेती यूपी सरकार
लखनऊ। अपने ही घर में बेगानी हो गई है साइकिल। सारी दुनिया में साइकिल की शान बढती जा रही है लेकिन हिन्दुस्तान के जिस उत्तर प्रदेश में साइकिल वालों की सरकार है, वहीं साइकिल को पूछने वाला कोई नहीं है। सडकों पर भयंकर ट्रैफिक जाम और सांसों में जहर घोल रहे भीषण प्रदूषण के बावजूद सरकार का कोई भी नुमाइन्दा साइकिल से चलने को तैयार नहीं है। कानफोडू हूटर बजाती गाडियों में चलना ही वे अपनी शान समझते हैं। इतना ही नहीं साइकिल से चलने वालों के लिए भी यहां कोई साइकिल लेन नहीं। अब तो साइकिल स्टैंण्ड भी खत्म कर दिये गये। दिल्ली में साइकिल पर कोई टैक्स नहीं वसूलती सरकार लेकिन यूपी में साइकिल वालों की अखिलेश सरकार नौ फीसदी टैक्स वसूलती है। साइकिल को बढावा देने के लिए कोई भी सरकारी सुविधा उत्तर प्रदेश में नहीं दी जाती।
दिल्ली में साइकिल पर नहीं कोई टैक्स
कई मुल्कों में तो साइकिल के लिए अलग से इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किये गये हैं। फ्री में स्टैंण्ड, टैक्स में छूट सहित तमाम सुविधाएं दी जाती हैं लेकिन लखनऊ में साइकिल को बढावा देने के लिए अब तक कोई भी जहमत नहीं उठायी गई। व्यापारियों के मुताबिक, दिल्ली सरकार ने तीन हजार रूपये तक की साइकिल को टैक्स फ्री कर रखा है। इतनी रकम में एक नार्मल साइकिल व बच्चों की साइकिल की बडी रेंज आती है। इस छूट का मध्यम वर्गीय परिवार को अच्छा खासा लाभ मिलता है। दिल्ली में यूपी की अपेक्षा तीन सौ रूपये तक साइकिल सस्ती पडती है। लखनऊ साइकिल मर्चेन्ट वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष नवीन अरोडा ने बताया कि साइकिल पर वर्तमान में कुल 9 फीसदी टैक्स लगता है। इसमें से पांच फीसदी यूपी सरकार, दो फीसदी सेंट्रल व दो फीसदी एक्साइज ड्यूटी को मिलता है। हमने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पत्र भेजकर यूपी के टैक्स को खत्म करने की मांग की थी लेकिन अब तक सरकार की ओर से कोई जबाव नहीं दिया गया। सरकार की कार्य प्रणाली से भी नहीं लगता कि वह कुछ करेगी।
साइकिल कैपिटल से लें सबक
हालैंण्ड की राजधानी एमसटर्डम एक ऐसा शहर है जिसे दुनिया की साइकिल कैपिटल कहा जाता है। वहां ज्यादातर लोग साइकिल से ही सफर करते हैं। स्कूल-कालेज जाना हो, दफ्तर जाना हो या कहीं और जाना हो, सामान ले जाना हो, ज्यादातर काम साइकिल पर होता है। अमीर से लेकर गरीब तक सभी साइकिल से चलते हैं। वह सिर्फ इसलिए क्योंकि सरकार ने साइकिल के लिए ढेर सारी सहूलियतें दे रखी हैं। यहां साइकिल को पहले पास देने के लिए सिग्नल सिस्टम लगे हैं। उनका अलग बाइपास है। सडक पर बाइक से चलने पर 10 मिनट की पार्किंग के लिए पांच यूरो खर्च करने पडते हैं जबकि साइकिल के लिए फ्री है। वैसे भी सडक पर कार या बाइक पार्क करना पूरी तरह से प्रतिबंधित है। यहां के मुख्य स्टेशन पर एक साथ सात हजार साइकिलें खडी की जा सकती हैं। यहां पर सन 2007 से 10 के बीच में साइकिल प्रोजेक्ट पर 70 मिलियन यूरो खर्च किये गये। यानी सरकार की ओर से साइकिल को बढावा देने के लिए प्रति व्यक्ति 13 यूरो खर्च किये गये। यूपी में तो ये सोचा ही नहीं जा सकता।
Thursday, November 7, 2013
Air purity and peace go up in smoke with crackers
LUCKNOW: As Lucknowites lighted up firecrackers worth nearly Rs 35 crore this year, it resulted in an increase of air pollution by over 100% and noise pollution up to 37.35% in several areas of the city. The air and noise levels recorded on the Diwali day was much above the permissible limit, revealed a survey conducted by the Uttar Pradesh Pollution Control Board (UPPCB).
Like every year, UPPCB collected the data of air and noise levels twice-pre-Diwali (October 29) and Diwali-day (November 03). In Aliganj (residential area), the level of respirable suspended particulate matter (PM-10), which is an indicator of air pollution, was recorded at 429.3 microgram/ metre cubes on November 3 as compared to 184.5 microgram/ metre cubes on October 29. Similarly, the levels of sulphur dioxide and nitrogen dioxide soared 200% and 71.38%, respectively on Diwali day.
In Chowk (commercial area), the PM-10 level stood at 445.4 microgram/ metre cubes on Diwali day against 197.5 microgram/ metre cubes on pre-Diwali. Likewise, sulphur dioxide increased by 308% while nitrogen dioxide was more than 80% in the atmosphere on November 3.
"The standard PM-10 level in the air on a given day is 100 microgram/metre cubes. It means that the festive celebration caused over four times increase in air pollution in both areas," said J S Yadav, member-secretary, UPPCB. The survey also stated that this year, on Diwali day, the PM-10 level was more by 12.4 and 12% in Aliganj and Chowk area respectively in comparison to last year. There was, however, only slight increase in noise levels against last year, revealed the survey.
As per Lucknow Atishbazi Udyog Vyapar Mandal, denizens of Lucknow burned crackers worth around Rs 30 crore in 2012. This year, the price of crackers had gone up by about 10-15% and crackers worth nearly Rs 35 crore were sold. It implies that this time, crackers residents burst were almost equal to last year but they used crackers which produced more smoke but less noise during the festival.
Though the city recorded marginal rise in noise pollution in comparison to 2012, the noise level on Diwali-day was much above the prescribed limit. In case of residential areas, the noise level was recorded at 71.70 and 67.30 decibels in Aliganj and Indiranagar, respectively against the standard noise level of 55 decibels. In silent zones, the noise level rose at 73.81 decibels in Ram Manohar Lohia Hospital and 63.47 decibels in Sanjay Gandhi Post Graduate Institute. The standard noise level in silent zones, however, was only 50 decibels.
Likewise, in Hazratganj, a commercial area, the noise level touched 70.20 decibels against the permissible limit of 65 decibels. Talkatora, an industrial area, was different. The noise level was at 65.20 decibels which is less than the limit of 75 decibels. "This year, the noise level increased up to 37.35% in the city in comparison to the data collected on pre-Diwali. All the readings were taken from 6pm to 12am on both days," said Yadav.
Wednesday, November 6, 2013
लखनऊ की सडकों पर 200 किमी चली साइकिल सम्मान यात्रा
लखनऊ। साइकिल सम्मान यात्रा ने राजधानी की सडकों पर एक सप्ताह में करीब दो सौ किलोमीटर की दूरी तय की। प्रदूषण, जाम जैसे समस्याओं से जूझ रही लखनऊ की सडकों पर हजारों लोगों ने यात्रा का खुलकर समर्थन किया और माना कि साइकिलिंग के माध्यम से ही शहर को प्रदूषण व जाम से मुक्ति मिल सकती है। लोगों ने यह भी स्वीकार किया कि साइकिल चलाने से किसी की प्रतिष्ठा कम नहीं होती बल्कि इसकी मदद से राजधानी लखनऊ का मान बढाया जा सकता है।
उत्तम प्रदेश बनाओ मंच के बैनर तले 24 अक्टूबर से शुरू हुई साइकिल सम्मान यात्रा के बारे में पर्यावरण प्रेमी तारा पाटकर ने बताया कि मैंने यात्रा इसलिए अकेले चालू की क्योंकि अगर ज्यादा लोग यात्रा में चले तो वे भी सडकों पर जाम बढायेंगे, जो ठीक नहीं। जो संदेश यात्रा के माध्यम से हम देना चाहते हैं, वह अकेले भी राहगीरों तक आसानी से पहुंच रहा है। अकेले होने पर लोग आसानी से बातचीत भी कर लेते हैं, समूह में वे अपनी बात कहने में संकोच करते हैं। यात्रा प्रतिदिन विशालखंड, गोमतीनगर से प्रारंभ हुई और पहले लखनऊ के विभिन्न छोरों पर पहुंची फिर वहां से विधानभवन पर आकर संपन्न हुई।
पहले दिन यात्रा चिनहट तिराहे पहुंची फिर निशातगंज होते हुए विधानभवन पहुंची। इसी प्रकार दूसरे दिन इंदिरानगर, मुंशी पुलिया से कुकरैल पिकनिक स्पाट, तीसरे दिन इसी रूट से इंजीनियरिंग कालेज चौराहे, चौथे दिन चौक, ठाकुरगंज, बालागंज से दुबग्गा, पांचवें दिन कैंट, आलमबाग, कृष्णानगर, सरोजनीनगर से अमौसी, छठवें दिन कैंट, तेलीबाग से पीजीआई साइकिल सम्मान यात्रा पहुंची। फिर वहां से चलकर विधानभवन पर आकर संपन्न हुई। सातवें दिन यात्रा अंबेडकर पार्क, गोमतीनगर से शुरू होकर विधानभवन तक पहुंची। यात्रा में दो दिन एक पर्यावरण मित्र नंदराम सिंह यादव ने भी पूरा साथ निभाया। आठवें दिन यात्रा पहले हाईकोर्ट, कैसरबाग पहुंचेगी फिर वहां से मुख्यमंत्री आवास तक आयेगी।
मंच के अध्यक्ष तारा पाटकर ने कहा कि दिल्ली में मेट्रो रेल के आने से थोडी तो राहत मिली लेकिन सडकों पर जाम आदि कम नहीं हो पाया। उसकी वजह साइकिल को न अपनाना है। अगर 3-5 किलोमीटर दूरी तक रहने वाले लोग साइकिल से मेट्रो स्टेशन तक आते, तो दिल्ली को जाम और प्रदूषण से मुक्ति मिल जाती लेकिन झूठी शान के चक्कर में लोग कारें त्यागने को तैयार नहीं। और यही कारें दिल्ली को रूला रही हैं। अगर लखनऊ में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव हफ्ते में कम से कम एक दिन साइकिल से दफ्तर जाने की पहल करें, मंत्रियों व अफसरों को साइकिल अपनाने के निर्देश दें, सभी विभागों के निजी प्रतिष्ठानों को बाध्य करें तो लखनऊ के काया कल्प होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। समाजवादी पार्टी का चुनाव चिन्ह ही साइकिल है और अगर वह सप्ताह में एक दिन साइकिल डे घोषित करती है तो इससे उसे राजनैतिक फायदा होगा व देश में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक नई पहल होगी।
रास्ते में मिली हजार बाइक, साइकिलें सौ भी न दिखीं
लखनऊ। राजधानी के सभी कोनों से चलकर हर दिन विधानभवन तक आने वाली साइकिल सम्मान यात्रा 31 अक्टूबर को मुख्यमंत्री आवास पर पहुंचकर समाप्त होगी। वहां पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को एक ज्ञापन सौंपा जायेगा और उत्तर प्रदेश में साइकिल के सम्मान को फिर से बहाल कराने की मांग की जायेगी। यात्रा उत्तम प्रदेश बनाओ मंच के बैनर तले 24 अक्टूबर को चिनहट तिराहे से प्रारंभ हुई थी।
मंच के अध्यक्ष तारा पाटकर ने बताया कि साइकिल सम्मान यात्रा का आज छठवां दिन था और करीब 11.30 बजे संजय गांधी पीजीआई से यात्रा आरंभ की गई। आज की यात्रा की सबसे खास बात यह रही कि रास्ते में मिलने वाले साइकिल व बाइक सवारों की गिनती की गई। पीजीआई से लेकर हजरतगंज तक एक हजार से अधिक बाइक मिली लेकिन साइकिल सवार सौ का आंकडा भी नहीं छू पाये। सिर्फ 92 साइकिलें मिलीं। जहां तक कारों की बात थी तो उनकी संख्या भी 300 से ऊपर रही। पाटकर बताते हैं कि इस संबंध में जब लखनऊ साइकिल व्यापारी एसोसिएशन के महामंत्री नवीन अरोडा से पूछा गया था तो उनका कहना था कि राजधानी की साइकिल दुकानों में इस वक्त 90 फीसदी बच्चों की साइकिलें बिकती हैं, उन्हीं से हमारी रोजी रोटी चल रही है। वरना साइकिल की दुकानें बंद हो जायें। सडक किनारे बैठे साइकिल पंचर जोडने वालों ने भी बदहाली के चलते अब धंधा बदल दिया है। लखनऊ की आबादी जब 10 लाख भी नहीं थी तब हर दिन औसतन 300 साइकिलें बिकती थी और जब आबादी 40 लाख हो गई है तो 100 साइकिलें बेचना भी मुश्किल हो गया है।
पाटकर बताते हैं कि सबसे बडी विडम्बना ये है कि साइकिल बेचने वाले स्वयं भी अब साइकिल से चलना पसंद नहीं करते। वे भी अपनी दुकान बाइक या कार से आते हैं। यात्रा के दौरान तेलीबाग में शनि मंदिर के पास कुछ लोगों ने हमसे पूछा कि क्या आप रोज साइकिल चलाते हैं तो हमने कहा कि हां, अगर पांच किलोमीटर तक किसी काम से जाना है तो हम साइकिल का ही इस्तेमाल करते हैं। घर से सब्जी लेने या अन्य काम करने के लिए बाइक या कार का इस्तेमाल न करने का हम संकल्प ले चुके हैं। अगर लोग इतना ही करना शुरू कर दें तो सडकों को काफी राहत मिल जायेगी। जिन लोगों के दफ्तर या दुकानें घर से तीन किलोमीटर की दूरी में हैं, वे साइकिल से जायें तो सडकों पर जाम भी काम लगेगा, डीजल, पेट्रोल भी बचेगा और प्रदूषण भी कम होगा। राजधानी में बढते प्रदूषण पर काफी लगाम लगाई जा सकती है।
उन्होंने कहा कि यात्रा के दौरान लोग सम्मान यात्रा को काफी सराह रहे हैं। बहुत से लोग तो तुरंत साइकिल चलाने का संकल्प भी ले रहे हैं। हम मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मुलाकात में यही आग्रह करेंगे कि वे जिस तरह चुनाव पूर्व साइकिल को वरीयता देते थे, फिर से वरीयता दें, अपने मंत्रियों, अफसरों को निर्देश दें। साइकिल यात्रा में पिछले दो दिन से पर्यावरण प्रेमी नंदराम सिंह यादव भी पूरा साथ दे रहे हैं।
हवाई जहाज की उडानों के बीच आकर्षण का केन्द्र बनी साइकिल
अमौसी से निकली साइकिल सम्मान यात्रा
लखनऊ। हवाई जहाजों की उडानों के बीच अमौसी हवाई अड्डे इलाके में आज साइकिल अचानक सबके आकर्षण का केन्द्र बन गई लेकिन यह साइकिल न तो बेहद कीमती व अलग किस्म की थी और न ही सात समुंदर पार से यहां लाई गई थी। यह पुराने स्टाइल की एक शुद्ध देशी साइकिल थी लेकिन उसमें बंधी तख्तियों में जो बेसकीमती नारे और टिप्स लिखे थे, वे सबका ध्यान अपनी ओर खींच रहे थे। सडक के किनारे वाहन का इंतजार कर रहे लोगों की आंखें भी उस पर टिंकी थीं और गाडियों से गुजरते लोगों की भी।
बाइक और कार के इस दौर में जब लोग साइकिल को भूल से गये हैं, वह लोगों की दिनचर्या से दूर हो गई है, किसी ने पूछा कि ये साइकिल सम्मान यात्रा क्या है, क्या साइकिल का प्रचार है। यात्रा पर निकले उत्तम प्रदेश बनाओ मंच के प्रमुख तारा पाटकर ने बताया कि हां, साइकिल पर विलुप्त होने का खतरा मंडराने लगा है, इसलिए लोगों को साइकिल की उपयोगिताएं याद दिलाई जा रही हैं। अगर आप साइकिल को सम्मान देंगे तो पर्यावरण को सम्मान देंगे और आपको भी सम्मान मिलेगा। प्रदूषण कम होगा, लोगों का स्वास्थ्य सुधरेगा तभी उत्तर प्रदेश उत्तम प्रदेश बनेगा।
राजधानी की सडकों पर पिछले पांच दिन से चल रही साइकिल सम्मान यात्रा आज दोपहर करीब 11.45 बजे अमौसी से शुरू हुई। अभी तक तारा पाटकर अकेले ही यात्रा कर रहे थे लेकिन आज उनके साथ एक पर्यावरण मित्र नंदराम सिंह यादव भी चल रहे थे। अमौसी मोड पर चाय की दुकान में चाय की चुस्कियां ले रहे आरएस चौधरी ने पूछा कि साइकिल चलाइये, सडकों से जाम भगाइये, ये तो समझ में आता है लेकिन साइकिल चलाइये, दौलत कमाइये, ये बात समझ में नहीं आई। पाटकर ने बताया कि मोटरसाइकिल, कार आदि चलाने से औसतन एक से तीन हजार रूपये तक लोग डीजल, पेट्रोल, सीएनजी आदि पर खर्च करते हैं। अगर छोटी दूरी तय करने में साइकिल का इस्तेमाल किया जायेगा तो कम से कम एक हजार रूपये तक की मासिक बचत होगी। अगर हम सेहत बनाने जिम जाते हैं तो वहां भी हजार-पांच सौ तो देने ही होंगे। इस तरह हर महीने करीब दो हजार, एक साल में 24 हजार रूपये की बचत होगी जिस धनराशि को हम किसी और जगह इस्तेमाल कर सकते हैं।
तारा पाटकर ने बताया कि लोग तनाव, डायबिटीज आदि को दूर करने के लिए तमाम दवाएं नियमित रूप से खाते हैं। अगर वे रोज एक घंटे साइकिल चलाएगें तो उनका मानसिक तनाव गायब हो जायेगा और डायबिटीज आदि भी नियंत्रण में रहेगी। दवाओं पर खर्च होने वाला हजारों रूपये भी बचेगा। अमौसी से चलने के बाद सम्मान यात्रा वाली ये साइकिल सरोजनीनगर, कृष्णानगर, आलमबाग, चारबाग, हुसैनगंज से लेकर विधानभवन तक लोगों के लिए आकर्षण का केन्द्र बनी रही। रास्ते में बहुत से लोगों ने साइकिल सम्मान यात्रा की तारीफ करते हुए यह कहा कि वाकई जिस तरह से शहरों में बेइंतहाशा बढ गयी कारों, आटो, बसें व मोटरसाइकिलों से रोज जाम भयानक समस्या बनता जा रहा हैं, प्रदूषण सबको रूला रहा है, साइकिल से चलना ही एकमात्र समाधान बचा है। साइकिल की मदद से ही हम पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों से निपट सकते हैं। कल साइकिल सम्मान यात्रा पीजीआई से शुरू होगी और विधानभवन तक आयेगी।
प्रभु के सच्चे सेवक हैं साइकिल चलाने वाले-पाटकर
लखनऊ। साइकिल चलाने वाले प्रभु के सच्चे सेवक हैं और साइकिल चलाना असली प्रार्थना। प्रभु उनसे खुश होते हैं। यही लोग तो ऐसे हैं जो प्रभु की बनाई इस खूबसूरत दुनिया को प्रदूषित करके नुकसान नहीं पहुंचाते। शहर की प्रदूषित सांसों में और जहर नहीं घोलते। वे ट्रैफिक जाम का कारण नहीं बनते। बाकी सभी तो बस उसकी कायनात को बरबाद करने में ही लगे हैं। साइकिल सम्मान यात्रा लोगों को यही संदेश देना चाहती है कि वे साइकिल को अपनायें और पर्यावरण के सच्चा प्रहरी बनें।
ये उदगार आज उत्तम प्रदेश बनाओ मंच के प्रमुख तारा पाटकर ने व्यक्त किये जो राजधानी के विभिन्न कोनों से अकेले ही रोज साइकिल सम्मान यात्रा निकाल रहे हैं और 20-25 किलोमीटर चलते हैं। यात्रा का आज चौथा दिन था। यात्रा करीब 11.30 बजे दुबग्गा स्थित वरदानी हनुमान मंदिर से शुरू की गई। साइकिल में “पर्यावरण पूजा ही असली पूजा, साइकिल को सम्मान दो, साइकिल चलाएं तनाव भगाएं ” जैसे नारों वाली तख्तियां लगी थी जो लोगों का ध्यान बरबस अपनी ओर खींच रही थीं। यात्रा बालागंज, ठाकुरगंज, चौक, रूमी गेट होते हुए विधानभवन पर संपन्न हुई।
इस मौके पर इकट्ठे हुए लोगों से बातचीत में तारा पाटकर ने कहा कि अब सिर्फ मंदिर में जाकर घंटी बजाने से प्रभु आपकी प्रार्थना नहीं स्वीकार करने वाले, बल्कि आपको संकट में फंसी उसकी कायनात को बचाने के लिए कुछ करना होगा। लगातार बढ रहे पर्यावरण संकट को दूर करने में योगदान देने से ही आपकी प्रार्थना स्वीकार होगी। लखनऊ शहर भी अपनी खूबसूरती व नवावी तहजीब के लिए मशहूर था लेकिन अब सडकों पर बढती गाडियों, जाम व प्रदूषण ने शहर को बदसूरत व दम घोंटू बना दिया है। इन समस्याओं से निजाद पाने के लिए साइकिलिंग सबसे बेहतर तरीका है जिसके माध्यम से आप पर्यावरण को बेहतर बना सकते हैं और खुद को फिट भी रख सकते हैं।
श्री पाटकर ने कहा कि साइकिल चलाने से किसी की प्रतिष्ठा कम नहीं होती बल्कि बढती है। अब वक्त आ गया है कि बडे लोग साइकिलिंग की पहल करें। अगर बडे लोग छोटे-छोटे घरेलू कामकाज निपटाने के लिए साइकिल से चलने लगें तो उनकी देखा-देखी और लोग भी वैसा करने लगेंगे। लोगों को प्रयास करना चाहिए कि हफ्ते में एक-दो दिन साइकिल से दफ्तर भी जायें। मेरे एक पडोसी हैं जो शहर के प्रतिष्ठित डाक्टर भी हैं। मै देखता हूं कि वे सडक के उस पर बने जिम में जाने के लिए भी कार का इस्तेमाल करते हैं। वे चाहें तो दो कदम पैदल चलकर भी जिम जा सकते हैं लेकिन वे ऐसा इसलिए नहीं करते क्योंकि उनको लगता है इससे उनकी प्रतिष्ठा कम हो जायेगी। वे लंबी कार के माध्यम से जिम में आने वाले अन्य लोगों को अपनी शान-ओ-शौकत भी दिखाना चाहते हैं। अब इस सोच को बदलना होगा। साइकिल सम्मान यात्रा कल अमौसी से शुरू होगी।
विज्ञान नगरी में स्कूली बच्चों ने लिया साइकिल सम्मान का संकल्प
लखनऊ। कुकरैल के बाद साइकिल सम्मान यात्रा शनिवार को इंजीनियरिंग कालेज चौराहे से निकली। जब यात्रा पुरनिया होते हुए आंचलिक विज्ञान नगरी पहुंची तो वहां कानपुर से आये एक दर्जन से अधिक बच्चों व शिक्षकों ने साइकिल सम्मान करने का संकल्प लिया। लेकिन यात्रा के लिए शनिवार का दिन शुभ नहीं रहा। तीन जगह उसे बडी-बडी कारों व अन्य वाहनों के बीच जाम से जूझना पडा। कपूरथला, आईटी चौराहे व हजरतगंज के मुख्य चौराहे पर तो वाहनों की लंबी कतार देखकर यातायात पुलिस भी असहाय नजर आई।
पिछले दो दिनों की तरह आज भी साइकिल संकल्प यात्रा सुबह साढे दस बजे गोमतीनगर से इंजीनियरिंग कालेज के लिए रवाना हुई। विश्वास खंड, पालीटेक्निक व मुंशी पुलिया आदि चौराहों में से ऐसी कोई जगह नहीं दिखी जहां वाहनों की लंबी कतारें न मिली हों। यात्रा को इंजीनियर कालेज चौराहा होते हुए विधानभवन तक पहुंचने में ढाई घंटे लग गये। हकीकत तो यह है कि सडकों पर अब इतनी जगह ही नहीं बची कि साइकिल की सवारी की जा सके। लेकिन यात्रा का मकसद तब जरूर पूरा होता दिखाई दिया जब जाम में फंसे कार व मोटरसाइकिलों पर सवार लोग उत्सुकतावश तख्तियों में लिखे “साइकिल को सम्मान दो ” जैसे नारों को बार-बार दोहरा रहे थे।
सडकों पर बेतहाशा बढ गये वाहनों से उपजे जाम, प्रदूषण और बीमारियों के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए यात्रा शुरू करने वाले तारा पाटकर ने बताया कि यात्रा के दौरान लोग कई रोचक सवाल भी कर देते हैं। जैसे आज ही इंजीनियरिंग कालेज चौराहे पर सडक किनारे पान की गुमटी लगाये संतोष चौरसिया ने पूछा, क्या ये साइकिल सम्मान यात्रा समाजवादी पार्टी का प्रचार है ? तब मैंने कहा, नहीं, ये तो पर्यावरण के प्रति लोगों को जागरूक करने का एक प्रयास है। गहराते पर्यावरण संकट को दूर करने के लिए साइकिल के माध्यम से हम व्यक्तिगत रूप से काफी योगदान दे सकते हैं। संतोष ने ये बात सुनकर सबसे पहले साइकिल सम्मान की शपथ ली। उसके बाद आंचलिक विज्ञान नगरी में कानपुर से आये करीब एक दर्जन बच्चों व उनके शिक्षकों ने ज्यादा से ज्यादा साइकिल प्रयोग करने का संकल्प लिया। इन बच्चों में अंशिका, नूपुर, आकाश, मोहित, अक्षय, पंकज आदि शामिल थे जिनको उनके शिक्षक अनुपम सारस्वत ने प्रेरित किया।
कपूरथला में जाम में फंसी एक टाटा सफारी पर अकेले सवार विनय सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा कि साइकिल की सवारी वाकई अच्छी है। वाकिंग और साइकिलिंग न कर पाने की वजह से ही मेरा पेट इतना अधिक निकल आया है। सोचता हूं कि अब मैं भी सुबह साइकिलिंग शुरू कर दूं। साइकिल सम्मान यात्रा कल दुबग्गा से शुरू होगी।
तनाव रोकने
की सस्ती व कारगर दवा है साइकिलिंग-पाटकर
कुकरैल से
विधानभवन तक निकली साइकिल सम्मान यात्रा
लखनऊ। अगर एक
वयस्क इंसान नियमित रूप से एक दिन में 60 मिनट साइकिलिंग करता है तो तनाव उसके पास
फटक नहीं सकता। अब तो डाक्टर भी स्वीकार कर चुके हैं कि साइकिल चलाने से मानसिक
तनाव घटता है। जब हम साइकिलिंग करते हैं तो शरीर में रक्त संचार बढ जाता है और
पिटूयटरी व एड्रीनल ग्रंथियों से निकलने वाले हारमोन्स का स्रावण अधिक होने लगता
है जो तनाव को कम करने में बडी भूमिका निभाते हैं। साइकिल सम्मान यात्रा के तहत
राजधानी की सडकों पर पैडल भांज रहे तारा पाटकर ने आज ये बात कही।
कुकरैल
पिकनिक स्पाट से शुरू हुई दूसरे दिन की यात्रा जब दस किलोमीटर दूर विधानभवन पर
संपन्न हुई तो उन्होंने कहा कि भागम-भाग वाली इस जिन्दगी में मानसिक तनाव सबसे बडी
बीमारी बनती जा रही है। इसी तनाव से इंसान डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, ह्रदय रोग आदि
बढ रहे हैं। साइकिलिंग ऐसे रोगों को रोकने की एक सस्ती व कारगर दवा है। पाटकर ने
कहा कि साइकिल चलाने का असली मौसम तो अब आ रहा है। ठंड साइकिलिंग के लिए सबसे
बढिया मौसम है। चूंकि सर्दी में पसीना
नहीं निकलता, इसलिए भोजन, पानी आदि के माध्यम से शरीर में प्रवेश करने वाले
टाक्सिन भी बाहर नहीं निकल पाते। साइकिलिंग के माध्यम से पसीना बहाकर हम ऐसे
टाक्सिन आसानी से शरीर से उत्सर्जित कर सकते हैं। युवाओं को एक घंटे और बुजुर्गों
को 20-25 मिनट की साइकिलिंग इस मौसम में जरूर करना चाहिए। युवाओं को एक दिन में
सामान्यतः 10-15 किलोमीटर तक साइकिल चलाना चाहिए।
उत्तम प्रदेश
बनाओ मंच के अध्यक्ष तारा पाटकर ने बताया कि साइकिल तो मोबाइल जिम है जिसके माध्यम
से हर तरह की एक्सर्साइज मुफ्त में हो जाती है। गरीब इसी साइकिल जिम के सहारे अपने
को फिट रखते हैं। न उनका पेट निकलता है और न तनाव उनको डस पाता है। उन्होंने कहा
कि सामान्य आदमी के शरीर को एक दिन में 5-6 लीटर पानी की जरूरत होती है। गर्मियों
में तो लोग पर्याप्त पानी पी लेते हैं लेकिन सर्दी में वे बहुत कम पानी पीते हैं
और शरीर से टाक्सिन निकलने में अवरोध पैदा होने लगता है। साइकिल चलाने के बाद
इंसान को जोरदार प्यास लगती है और वो आसानी से पानी पी लेता है। साइकिल चलाने
वालों के फेफडे भी मजबूत रहते हैं। चीन, जापान और यूरोप के मुल्कों में साइकिल को
काफी सम्मान मिलता है। लोग साइकिल का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करते हैं इसलिए वहां
प्रदूषण, ट्रैफिक जाम आदि की समस्या है ही
नहीं। काश, हमारे देश में भी वो वक्त जल्दी आये। तारा पाटकर ने बताया कि साइकिल
सम्मान यात्रा तीसरे दिन पूर्वान्ह 11 बजे इंजीनियरिंग कालेज चौराहे से शुरू होगी
और विधानभवन पर आकर संपन्न होगी।
चिनहट से विधानभवन तक निकली साइकिल सम्मान यात्रा
मुख्यमंत्री से की “साइकिल डे” घोषित करने की मांग
लखनऊ। उत्तम प्रदेश बनाओ मंच ने आज चिनहट से विधानभवन तक साइकिल सम्मान यात्रा निकाली और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से सप्ताह में एक दिन “साइकिल डे” घोषित करने की मांग की। मंच के अध्यक्ष तारा पाटकर ने कहा कि साइकिल की सवारी से ही उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाया जा सकता है। साइकिल चलाने से लोगों का स्वास्थ्य बेहतर रहेगा और पर्यावरण भी प्रदूषणमुक्त रहेगा। सडकों को जाम से मुक्ति मिलेगी। साथ ही हर महीने डीजल, पेट्रोल पर खर्च होने वाले करोडों रूपये भी बचेंगे। कुल मिलाकर साइकिल के सम्मान से तमाम तरह की परेशानियों से प्रदेश वासियों को राहत मिलेगी।
उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री को सप्ताह में एक दिन स्वयं साइकिल से दफ्तर जाना चाहिए और अपने सभी मंत्रियों व अफसरों को कार के बजाय साइकिल से आने के लिए निर्देश देना चाहिए। इससे आम जनता भी ऐसा करने के लिए प्रेरित होगी। राजधानी लखनऊ में एक दिन ऐसा भी होना चाहिए जब सडकों पर कोई वाहन ही न दिखें। सिर्फ साइकिल और रिक्शे ही चलें। रिक्शे उनके लिए जो साइकिल से चलने में असमर्थ हैं। साइकिल के माध्यम से हम पर्यावरण संरक्षण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं।
पाटकर ने कहा कि सडकों पर साइकिलों की संख्या दिन प्रति दिन घटती जा रही है। कार व बाइक की संख्या ज्यादा हो गई है। लोग घर के छोटे-छोटे काम निपटाने के लिए चंद कदम जाने में भी मोटर गाडियों का इस्तेमाल कर रहे हैं। जिससे दुर्घटनाओं में भी भारी इजाफा हो रहा है। जिसे रोकने के लिए अब साइकिल का प्रयोग बहुत अनिवार्य हो गया है।
भारी ट्रैफिक व शोर-शराबे के बीच यात्रा चिनहट से पूर्वान्ह 11 बजे शुरू हुई और इंदिरानगर, निशातगंज, सिकंदरबाग, अशोक मार्ग, हजरतगंज होते हुए विधानभवन की परिक्रमा करने के बाद लगभग 12 बजे दारूलशफा पहुंचकर खत्म हुई। साइकिल यात्रा के दौरान सडकों पर तमाम लोग बार-बार अपने वाहन धीमा करके उत्सुकता से यात्रा का सबब जानने की कोशिश कर रहे थे। कल शुक्रवार को साइकिल सम्मान यात्रा पूर्व निर्धारित समय 11 बजे कुकरैल पिकनिक स्पाट चैराहे से शुरू होगी और विधानभवन तक चलेगी। शनिवार को इंजीनियरिंग कालेज चैराहे से, रविवार को दुबग्गा से, सोमवार को अमौसी से, मंगलवार को, एसजीपीजीआई से, बुधवार को अंबेडकर पार्क, गोमतीनगर और गुरूवार को हाईकोर्ट से शुरू होकर विधानभवन पर आकर संपन्न होगी।
Tuesday, November 5, 2013
दीपावली के तोहफे में मिलेगा शहर को दो सौ टन अतिरिक्त कचरा
लखनऊ, 4 नवंबर। दीपावली के तोहफे में शहरवासी लखनऊ को दो सौ टन अतिरिक्त कचरे का तोहफा देंगे। रोज शहर से करीब 14 सौ टन कूडा निकलता है। दीवाली के बाद अगले दिन सोमवार को यह बढकर सोलह सौ टन हो जायेगा। नगर स्वास्थ्य अधिकारी डा. पीके सिंह ने बताया कि नगर निगम इस कूडे को बटोरने के लिए विशेष व्यवस्था कर रहा है।
UPPCB says crackers
produce 1,600 mt tones of toxic waste
Lucknow; Before lighting up a bomb or sparkler this Diwali, think of
the harmful metals and chemicals that go into the making of firecrackers to
emit bright, colourful and shimmering lights and a booming sound. Since substances
in crackers are toxic, the waste generated poses severe threat to environment. According
to Uttar Pradesh Pollution Control Board (UPPCB), bursting of firecrackers
generated 1,600 metric tone of waste containing harmful substances and chemicals
in Lucknow on Diwali day in 2012. Every year, the toxic waste produced by fire
crackers goes up by nearly 100-150 metric tones, say experts. “After Diwali
festivities, toxic waste is thrown at either landfill sites or the river which
affects the ecosystem adversely. The poisonous metals in the waste enter the
food chain through soil and water. As it directly impacts the environment and
health. It can cause serious diseases and even lead to death by lead poisoning and
other such,” said Anoop Mishra, president of Sankalp Parivar, who has been
creating awareness among students about hazards of burning crackers for the
past many years. Mishra added that the metal loaded with fire crackers also
results in death of animals and plants.
Every year there has been
significant increase in the level of noise and air pollution during Diwali compared to
other days. As per a survey conducted by Central Pollution Control Board which
studied the air pre-diwali and Diwali day, pollution level had gone up by 56%
and 42% in Indiranagar and Gomtinagar, respectively. Similarly, noise pollution
in several areas of the city was more than the standards for noise levels
during day and night hours. Experts also said the crackers contain elements
like copper, cadmium, sulphar, aluminium, barium and various others that help
in releasing vibrant colours after it is ignited. Once a cracker is burnt, it
releases toxic chemicals that remain suspended for long time causing serious
health ailments. “Harmful substances produced by crackers settle on tree leaves
or any other surface in dust form. As it remains in atmosphere for a longer duration,
people inhale it regularly which causes many breathing problems,” said Dr. PK
Gupta.
Monday, November 4, 2013
आतिशबाजी शुरू होते ही धुआं-धुआं हो गई सडकें
आतिशबाजी शुरू होते ही धुआं-धुआं हो गई
सडकें
लखनऊ, 4 नवंबर। महंगाई भी आतिशबाजी के शौकीनों को नहीं रोक पाई। बच्चे तो
क्या बडे-बूढे और समझदार लोग जो खुद को पर्यावरण का बहुत बडा हितैषी होने का दावा
करते हैं, वे भी देखा-देखी
के फेर में सब कुछ भूल गये और ईश्वर की इस खूबसूरत कायनात को घायल करने में नहीं
चूके। आलम तो यह था कि दीवाली की पूजा के बाद कुछ घंटों की आतिशबाजी में ही शहर की
सडकों पर धुआं ही धुआं छा गया। वाहनों की गति धीमी हो गई। पटाखों के कचरे, कूडा-करकट से सडकें और मुहल्लों की गलियां
पट गईं। उम्मीद थी कि पिछले वर्षों के कटु अनुभव से लोग कुछ सबक लेंगे लेकिन कहीं
भी ऐसा देखने को नहीं मिला। बल्कि उल्टा ही हुआ। इस वर्ष आतिशबाजी का कहर और
ज्यादा बढ गया। हालांकि तेज आवाज वाले पटाखों की तुलना में आसमानी व रोशनी करने
वाले पटाखों ज्यादा जलाए गये। रविवार को तापमान में कमी रही। जिससे मौसम भी बदला
बदला नजर आया। आसमान साफ होने की वजह से धुआं छट नहीं पाया और धुएं की एक चादर सी
वातावरण में बिछी रही। पेडों की पत्तियों में भी प्रदूषण की मोटी परतें जमी दिखी।
दीवाली के चंद घंटों में जो कहर वातावरण पर छाया, उससे हुए नुकसान की भरपाई करने में प्रकृति को हफ्तों तो लग
ही जायेंगे। श्वास और अस्थमा संबंधी बीमारियों से पीडित लोगों के लिए तो भारी
मुसीबत रहेगी।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार अलींगंज, विकासनगर, जानकीपुरम,
कल्याणपुर, खुर्रमनगर, इंदिरानगर,
गोमतीनगर, आलमबाग, राजाजीपुरम समेत शहर के अधिकांश इलाकों में जमकर आतिशबाजी
हुई। पटाखों के थोक बाजार में साढे सात बजे के बाद पटाखों के बडे आइटम खत्म हो गये
थे। आतिशबाजी कारोबारियों के अनुसार रविवार को अकेले करीब बीस करोड की आतिशबाजी का
कारोबार हुआ।
दीपावली के तोहफे में मिलेगा शहर को दो सौ
टन अतिरिक्त कचरा
लखनऊ, 4 नवंबर। दीपावली के तोहफे में
शहरवासी लखनऊ को दो सौ टन अतिरिक्त कचरे का तोहफा देंगे। रोज शहर से करीब
14 सौ टन कूडा निकलता है। दीवाली के बाद अगले दिन सोमवार को यह बढकर सोलह सौ टन हो
जायेगा। नगर स्वास्थ्य अधिकारी डा. पीके सिंह ने बताया कि नगर निगम इस कूडे को
बटोरने के लिए विशेष व्यवस्था कर रहा है।
India against pollution: Cycle Samman Yatra
लखनऊ शहर को प्रदूषणमुक्त शहर बनाना है। कभी अपनी गंगा-जमुनी तहजीब के लिए दुनिया भर में मशहूर नवाबों की यह नगरी आज प्रदूषण की राजधानी बन गई है। इतनी अधिक गाडियां हो गई हैं कि अब सडकों पर चलना मुश्किल हो गया है। ट्रैफिक जाम, ध्वनि, वायु और जल प्रदूषण ने शहर की आवोहवा में जहर घोल दिया है। अब साइकिल की सवारी अपनाकर ही शहर की बिगडती सूरत को बचाया जा सकता है और इसके लिए अखिलेश सरकार को सप्ताह में एक दिन साइकिलिंग डे घोषित करना चाहिए।
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