Tuesday, November 19, 2013
साइकिल पर सभ्यता का संकट
सुनीता नारायण
इन दिनों जब मैं यह लिख रही हूं, अपने बिस्तर पर पडी हूं और एक ऐसे एक्सीडेंट से उबरने की कोशिश कर रही हूं जिसने मेरी हड्डियां तोड दी हैं। मुझे एक कार ने तब टक्कर मार दी थी जब मैं साइकिल पर सवार होकर कहीं जा रही थी। टक्कर मार कर कार गायब हो गयी और मैं सडक पर लहूलुहान तडपती रही। ऐसा देश के हर शहर की तकरीबन हर सडक पर होता रहता है क्योंकि हमारे यहां सडकों पर पैदल यात्रियों और साइकिल सवारों की सुरक्षा की परवाह नहीं की जाती। ये लोग अक्सर बहुत मामूली सा काम करने हुए मर जाते हैं-जैसे सडक पार करना। मैं खुशनसीब थी कि मेरे लिए दो कार रूकीं। अजनबियों ने मेरी मदद की और मुझे अस्पताल तक पहुंचाया जहां मेरा इलाज हुआ। अब मैं स्वस्थ होकर फिर से वापसी करूंगी।
यह एक ऐसी जंग है जिस पर हम सभी को ध्यान देने की जरूरत है। हमें पैदल चलने और साइकिल चलाने के लिए जगह की जरूरत है और इस अधिकार को हम छोड नहीं सकते। जब से मेरे साथ यह एक्सीडेंट हुआ, मेरे रिश्तेदार और दोस्त मुझे लगातार इस बात के लिए फटकारते रहे हैं कि मैं दिल्ली की सडकों पर इस तरह लापरवाह होकर साइकिल क्यों चला रही थी, मुझे लगता है कि वे लोग सही कह रहे हैं। यहां साइकिल सवारों और पदयात्रियों के लिए कोई अलग लेन नहीं है, सडकों के बाद जो थोडी जगह बच जाती है, उन पर या तो कूडे के ढेरों का कब्जा होता है या वहां भी कार ही पार्क कर दी जाती हैं। सडकें कार के लिए हैं, बाकी किसी का कोई महत्व नहीं है। वैसे यहां साइकिल चलाना या पैदल चलना सिर्फ इसलिए कठिन नहीं है कि इसके लिए कोई योजना नहीं बनी है बल्कि इसके पीछे हमारी उस मानसिकता का भी दोष है जो यह मानतीहै कि केवल कार पर चलने वालों का ही स्टेट्स होता है और सडकों पर उन्हीं का अधिकार है जो साइकिल पर चलते हैं, गरीब हैं, दयनीय हैं और अगर मिट नहीं गये तो उन्हें अंततः हाशिए पर ही चले जाना है।
यही वह बात है जिसे बदलना होगा। हमारे पास कोई विकल्प नहीं है, सिवा इसके कि हम परिवहन के मसले को फिर से परिभाषित करें। जैसा मैं बार-बार कहती रहती हूं। इस हफ्ते दिल्ली की फिजा में जहरीले धुएं का साया और गहरा गया है। पिछले महीने विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वायु प्रदूषण को मानवीय कैंसर की संज्ञा दी थी। हमें हर हाल में समझना होगा कि प्रदूषण को किसी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। यह हमें मार रहा है और यह प्रक्रिया अब धीमी नहीं रही है। अगर हम वायु प्रदूषण से मुकाबला करना चाहते हैं तो हमारे पास कार की बढती संख्या पर लगाम लगाने के सिवाय कोई दूसरा चारा नहीं है।
हमें सीखना होगा कि कैसे लोग चलें, कारें नहीं। पिछली सजी के आखिरी दशक के मध्य में जब सेंटर फार साइंस एंड एन्वायरमेंट ने वायु प्रदूषण के खिलाफ अपनी मुहिम की शुरूआत की थी तो उसके प्रयास पूरी तरह पारंपरिक थे, उसने ईंधन की गुणवत्ता बेहतर करने, वाहनों के प्रदूषण स्तर को बेहतर बनाने और जगह-जगह पर इसकी जांच करने जैसी प्रक्रियाओं पर जोर दिया। उसने कम्प्रेस्ड नेचुरल गैस का इस्तेमाल बसों और आटोरिक्शा के लिए किए जाने की पैरवी की। इसमें कोई शक नहीं है कि अगर ये कदम नहीं उठाये जाते तो हालात और भी बदतर होते। मगर ये उपाय पर्याप्त साबित नहीं हुए। बहुत जल्द हमने यह समझ लिया। प्रदूषण का स्तर फिर से बढने लगा। सभी शोधों से एक ही कारण सामने आ रहा है और एक ही बडा समाधान दिख रहा है। वह है परिवहन तंत्र को अलग तरीके से विकसिती करना। हमारे पास ऐसा करने के विकल्प भी हैं। हमें और मोटराइज्ड होने, और प्लाईओवर बनाने या फोर लेन सडक बनाने की कतई जरूरत नहीं है, भारत के कई शहरों में आज भी लोग बसों पर सफर करते हैं, पैदल और साइकिलों पर चलते हैं।
ज्यादा से ज्यादा 20 फीसदी लोग ही बाइक पर चलते हैं। हम ऐसा करते हैं क्योंकि हम गरीब हैं पर अब चुनौती यह है कि अमीर होने के बावजूद हम ऐसा करें और इसी तरह अपने शहरों की परिवहन व्यवस्था को लागू करें। पिछले कुछ सालों से वस्तुतः हम यही करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि हमारे शहरों के लिए समेकित और सुरक्षित जन परिवहन विकल्प विकसित हो सके। इसलिए अगर हमारे पास कार है भी तो भी हमें इसे चलाने की जरूरत न पडे। हम मेट्रो रेल विकसित कर सकते हैं या बसें खरीद सकते हैं। मगर जब तक इसकी कनेक्टिविटी अंतिम घर तक नहीं होगी, यह कारगर नहीं होगा। इस व्यवस्था को सहज और सरल होना चाहिए। इसीलिए मैं कहती हूं कि हमें अलग तरीके से सोचने की जरूरत है। आज परिवहन तंत्र की चर्चा हो रही है जबकि हमें साइकिल सवारों और पदयात्रियों के लिए भी सोचने की जरूरत है, मगर यह खोखली बातें हैं।
(साभारःप्रभात)
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